अनुवाद के विभिन्न प्रकार: (Anuvad ke Vibhinn Prakar)
- शाब्दिक अनुवाद,
- शब्द-प्रतिशब्द अनुवाद,
- भावानुवाद और
- छायानुवाद
1. शाब्दिक अनुवाद ➡
इसमें वाक्य स्तर पर अनुवाद किया जाता है। यहां यथासाध्य मूलपाठ का अनुगम किया जाता है। इसमें एक भाषा के भाव का दूसरी भाषा में रूपांतर रूपांतरण करते हुए प्रत्येक शब्द, उपवाक्य, वाक्य आदि के महत्व पर ध्यान दिया जाता है। इसमें किसी शब्द या वाक्य की उपेक्षा नहीं की जाती।
यह अनुवाद वस्तुतः तथ्यात्मक और तकनीकी साहित्य में प्रयुक्त होता है। जैसे विज्ञान, विधि, इंजीनियरी आदि। इस प्रकार के साहित्य में हर शब्द और वाक्य का अपना महत्व होता है और उसका एक निश्चित अर्थ होता है। मूल कृति में कुछ हेरफेर आदि न करने से अनुवाद में प्रमाणिकता आती है।
2. शब्दप्रति-शब्द अनुवाद ➡
विज्ञान आदि विषयों के शोध प्रबंधों के विषय में विषय का अच्छा जानकर लक्ष्य भाषा में शब्द प्रति शब्द अनुवाद किए जाने पर रोज बातें समझ सकता है। तकनीकी, जर्मन, बिसिनस अंग्रेजी आदि के रूप में थोड़ी सी विदेशी भाषा सीखने वाले इसी उपाय से अनुवाद कर लेते हैं।
शाब्दिक अनुवाद सबसे अच्छा एवं आदर्श अनुवाद माना गया है। इसमें मूल का कोई शब्द जोड़ने की अनुमति नहीं है। प्रायः विज्ञान के ग्रंथ, विधि के ग्रंथ, संवैधानिक आदेश, प्रशासनिक पत्राचार आदि में शाब्दिक अनुवाद किया जाता है - बाईबिल, वेद आदि धार्मिक ग्रंथों के अनुवाद में भी शाब्दिक अनुवाद मिलता है।
उदाहरण;
प्रशासनिक सामग्री
House building advance rules 1984
The house must be maintained in good repair by the employee at his/her own cost. He/she shell also keep it free from all encumbrances and sale continue to pay all the municipal and other local rates and Taxes regulary until the advance has been repaired to the company in full.
गृह निर्माण अग्रिम नियमावली-
3. भावानुवाद ➡
अनुवाद कभी अनुच्छेद का, कभी पूरे वाक्य का, कभी शब्द का और कभी पूरे पाठ का होता है। इसमें लक्ष्य भाषा को अपनी शब्द रचना, वाक्य विन्यास, मुहावरा आदि की योजना अधिक रहती है। सर्जनात्मक कृतियों के विषय में भावानुवाद ही उचित है। इसमें भाव संवेदना की अभिव्यक्ति होती है। अनुवादक की अपनी शैली की भी छाप मिलती है।
इस अनुवाद की कमी यह है कि अनुवादक मूल कृति से कुछ आजादी लेकर अपनी इच्छा से लिखता है। अनुवाद में हम अनुवादक का व्यक्तित्व ही अधिक पाते हैं।
गद्य में यह अधिक नहीं खटकता। मगर पद्य में अभावनुवाद कभी-कभी अनुदित कविता को अनुवादक की अपनी रचना बना देता है। अनुवादक अपनी व्याख्या कर डालता है। यह मूल रचना से कुछ सामग्री लेकर उसके आधार पर अनुवादक की स्वतंत्र रचना हो जाती है। सामान्य पाठकगण ऐसे अनुवाद से मजा ले सकते हैं।
उदाहरण;
उमर खय्याम के रुबाइयात का फिट्जेराल्ड द्वारा अनुवाद अथवा फिट्जेराल्ड के अनुवाद का 'बच्चन' कृत अनुवाद।
4. छायानुवाद ➡
इसमें अनुवादक को पूरी छूट रहती है कि वह मुख्य भाव को लेकर पाठ रचना करे। छायावाद में मूल की छायामात्र होती है। उसके कथ्य का अनुकूलन लक्ष्य भाषा की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों के अनुसार किया जाता है।
डॉ. भोलानाथ तिवारी कहते हैं - "छायानुवाद ऐसे अनुवाद को कहा जाना चाहिए जो शब्दानुवाद की तरह मूल के शब्दों का अनुसरण न करे, अपितु दोनों दृष्टियों से मुक्त होकर उसकी छाया लेकर चले।"
रूपांतरण-
जैसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने मर्चेंट ऑफ वेनिस का अनुवाद दुर्लभ बंधु अर्थात बंगपुर का महाजन नाम से किया था। उन्होंने एंटोनियो को अनंत, बैसानियों को 'बसंत' तथा पोर्शिया तथा 'पुरश्री' नाम दे दिए।

![अनुवाद के विभिन्न प्रकार in Hindi अनुवाद के विभिन्न प्रकारों को विस्तार से समझाइए [2023] || Anuvad Ke Vibhinn Prakar in Hindi](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhWWq2KeLTefYBcbM4IKtjPPfB0QnEqWCBuV8DwOB7VIJ6NkNhMcfEA3EScO7HibR-FSorc6syBF5pPcqLZgOE90uZMNnXX8iXZUQ_3xGToXFwpxAo_GUkYqXd-RZkPG9HOuwZHW8YLrN_iudgE8XFASzYz2ukPP0xCtglYDLPhhQnFcHdHDQIRo2h-jg/w400-h225-rw/20230219_001812.jpg)
दोस्तों अगर आपको यह जानकारी पसंद आई है तो कृपया हमें कमेंट करके जरूर बताएं। धन्यवाद।