संस्कृतिकरण क्या है? / Sanskritikaran Kya Hai in Hindi
डॉक्टर एम.एन. श्रीनिवास ने दक्षिण भारत के कुर्ग लोगों के सामाजिक व धार्मिक जीवन के अध्ययन के आधार पर अपनी पुस्तक 'religion and Society among the coorgs of South India' (1952) में सर्वप्रथम संस्कृतिकरण की अवधारणा का उल्लेख किया है।
संस्कृतिकरण मुख्य रूप से जाति प्रथा के अंतर्गत क्रियाशील परिवर्तन की एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के द्वारा निम्न जाति के व्यक्ति उच्च जाति के संस्कारों व जीवनशैली को अपनाते हैं।
डॉक्टर एम.एन. श्रीनिवास जी का मानना है कि जाति व्यवस्था इतनी कठोर व्यवस्था नहीं है कि जिसमें प्रत्येक जाति की स्थिति सदैव के लिए एक सी निश्चित हो। उसमें गतिशीलता की संभावना हमेशा रही है।
इसलिए निम्न जातियों के लिए यह संभव है कि वे धीरे-धीरे अपने से उच्च जाति की स्थिति को प्राप्त करें और उनके संस्कारों तथा जीवन के ढंग को भी ग्रहण कर लें।
संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें "अपने से बड़े लोगों के जैसी अच्छी जीवनशैली ग्रहण करना या उनके अच्छे संस्कारों को अपनाना अपने जीवन में उतारना ही संस्कृतिकरण कहलाती है।"
संस्कृतिकरण का अर्थ एवं परिभाषा -
एम.एन. श्रीवास ने अपनी पुस्तक 'सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया' (1966) में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया को परिभाषित करते हुए लिखा है कि, " संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिंदू जाति या कोई जनजाति अथवा कोई अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति रिवाज, कर्मकांड, विचारधारा और जीवन पद्धति को बदलता है।
आमतौर पर ऐसे परिवर्तनों के पश्चात वह जाति परंपरा से स्थानीय समाज द्वारा संस्तरण में जो स्थान उसे मिला हुआ है उससे ऊंचे स्थान का दावा करने लगती है। साधारणतः बहुत दिनों तक बल्कि वास्तव में एक दो पीढ़ियों तक दावा किए जाने के बाद ही उन्हें स्वीकृति मिलती है।"
इस प्रकार स्पष्ट है कि जब निम्न जाति या अन्य कोई समूह जाति संस्तरण प्रणाली में उच्च रीति रिवाज, कर्मकांड, मूल्य, विचारधारा आदि को अपनाकर परंपरागत स्थिति को पहुंचा ऊंचा करने का प्रयास करते हैं तो इसी प्रक्रिया को संस्कृतिकरण कहा जाता है।
इसके अंतर्गत निम्न जाति के लोग अपनी संस्कृति की कुछ प्रथाओं जैसे मांस खाना, बलि देना, शराब पीना, इत्यादि को छोड़कर उच्च जाति की संस्कृति जैसे- जनेऊ धारण करना, माथे पर तिलक लगाना, छोटी रखना, मद्यपान, मांसाहार छोड़कर शाकाहारी भोजन करना एवं अपनी विचारधारा में भी पाप, पुण्य, मोक्ष, कर्म, धर्म आदि को सम्मिलित करके जाति संस्तरण में ऊंची स्थिति प्राप्त करने का दावा करते हैं।
हालांकि यह जरूरी नहीं कि उस जाति को उच्च स्तर की स्वीकृति मिल ही जाए, क्योंकि निम्न जातियों के द्वारा उच्च जाति की सांस्कृतिक परंपराओं का अनुकरण करने पर प्रारंभ उच्च जातियों द्वारा इसका विरोध भी किया जाने लगता है।
योगेंद्र सिंह ने संस्कृतिकरण को परिभाषित करते हुए कहा है कि- "संस्कृतिकरण से अभिप्राय वैसी वास्तविक या इच्छित सांस्कृतिक गतिशीलता से है जो स्थापित वृहत संस्कृति तथा जातीय सामाजिक संस्तरण के ढांचे के अंतर्गत होता है।"
आंद्रे बेते ने संस्कृतिकरण को और स्पष्ट ढंग से परिभाषित करने का प्रयत्न किया है। उनके अनुसार, "संस्कृतिकरण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके द्वारा एक जाति या व्यक्तियों का समूह ऊंची जातियों की परंपरा से चली आ रही जीवन शैली को अपनाकर सामाजिक सोपानक्रम में ऊपर उठाता है।"
संस्कृतिकरण की विशेषताएँ / Sanskritikaran ki Visheshtayen -
एमएन श्रीनिवास द्वारा प्रतिपादित संस्कृतिकरण की अवधारणा की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं -
#No.1 -
उच्च जातियों का अनुकरण -
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के द्वारा कोई निम्न जाति, जनजाति या अन्य समूह अपने से उच्च जाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) के विचारों, मूल्यों, कर्मकांड एवं रीति-रिवाजों में अपनाकर ही जातीय संस्तरण में अपनी उच्च स्थिति की दवा करती है।
अतः इस प्रक्रिया में उच्च जातियों का अनुकरण अनिवार्य है। इस संदर्भ में d.f. पोकॉक का कथन है कि "निम्न मानी जाने वाली जातियों के समक्ष आचरण के लिए आदर्श के रूप में वे जातियां रही हैं जो कि जातीय संस्तरण में उससे ऊपर मानी जाती हैं तथा जिनके साथ उनकी निकटता हो।"
#No.2 -
सामाजिक गतिशीलता की प्रक्रिया -
संस्कृतिकरण का संबंध सामाजिक गतिशीलता से है क्योंकि इसके द्वारा निम्न जाति की जीवन पद्धति व परंपराओं को अपनाकर अपनी परंपरागत स्थिति को ऊंचा उठाने का प्रयास करती है जिससे जातियों में गतिशीलता संभव होती है एवं इससे सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि होती है।
#No.3 -
जातीय संस्तरण में उच्च स्थिति का दावा -
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में निम्न जाति एवं अन्य समूह उच्च जातियों के कर्मकांडों, रीति-रिवाजों, मूल्यों, आदर्श आदि के अनुकरण से कुछ समय पश्चात उच्च होने का दावा करने लगते हैं तथा यह दावा उन्हें लगभग एक दो पीढ़ियों तक करना पड़ता है तब कहीं जाकर अन्य जातियां उनके दावे को स्वीकृत करती हैं।
#No. 4 -
सामूहिक प्रक्रिया -
संस्कृतिकरण एक सामूहिक प्रक्रिया है। इसका संबंध किसी एक व्यक्ति या परिवार से ना होकर संपूर्ण समूह से होता है। साथ ही यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया भी है।
#No. 5 -
संस्कृतिकरण केवल हिंदू जातियों तक ही सीमित नहीं -
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया केवल हिंदू जातियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह जनजातीयों एवं अन्य समूहों में भी पाई जाती है। उदाहरणार्थ पश्चिमी भारत के भीलों में मध्य भारत के गोंड एवं उराव जनजातियों में तथा हिमालय की पहाड़ियों में रहने वाली जनजातियों में भी इस प्रक्रिया को देखा गया है। वर्तमान में गोंड, थारु, भील स्वयं को ठाकुर अर्थात क्षत्रिय होने का दावा कर रहे हैं।
#No. 6 -
केवल पद मूलक परिवर्तन -
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के द्वारा निम्न जातियों की स्थिति में केवल पदम मूलक परिवर्तन ही होते हैं, कोई संरचनात्मक परिवर्तन नहीं। अर्थात उसका पद या स्थिति समुदाय में ऊंची होती जाती है, परंतु इससे उसके जातिगत एवं संस्करण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
#No. 7 -
अग्रिम समाजीकरण की प्रक्रिया -
डॉक्टर योगेंद्र सिंह ने संस्कृतिकरण को अग्रिम समाजीकरण की प्रक्रिया माना है क्योंक इसमें निम्न जाति किसी उच्च जाति की संस्कृति को इस आशा से अपनाती है कि भविष्य में उसे इस जाति में सम्मिलित कर लिया जाएगा।
# No. 8 -
संस्कृतिकरण के अनेक आदर्श मॉडल -
मिल्टन सिंगर ने बताया है कि संस्कृतिकरण के अनेक मॉडल हो सकते हैं जैसे ब्राह्मण, राजपूत वैश्य या अन्य प्रभावी जाति। एम.एन श्रीनिवास ने प्रारंभ में संस्कृतिकरण के अंतर्गत केवल ब्राह्मण जाति को आदर्श माना किंतु बाद में उन्होंने द्विज जाति एवं स्थानीय समुदाय में प्रभु जाति को भी संस्कृतिकरण का आदर्श माना। इस प्रकार संस्कृतिकरण के अनेक आदर्श मॉडल हो सकते हैं।
# No. 9 -
आर्थिक उन्नति आवश्यक शर्त नहीं -
आर्थिक उन्नति संस्कृतिकरण की आवश्यक शर्त नहीं है। श्रीनिवास ने मैसूर के 1 गांव रामपुरा के निम्न जाति का उदाहरण दिया है कि जिनका संस्कृतिकरण होने के बावजूद भी आर्थिक दशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
आर्थिक विकास राजनैतिक शक्ति प्राप्त करना, शिक्षा नेतृत्व तथा सामाजिक संस्तरण में ऊंचे उठने की इच्छा आदि संस्कृतिकरण के प्रमुख तत्व हैं और संस्कृतिकरण का प्रत्येक प्रकरण इन सभी या कुछ तत्वों को प्रदर्शित करता है।



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