मैक्स वेबर के अनुसार 'सत्ता की विशेषताएं' एवं 'सत्ता के प्रकार' | Satta Ki Visheshtayen In Hindi 2026

AKHILESH KUMAR
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सत्ता की विशेषताएं ( Satta Ki Visheshtayen In Hindi )

सत्ता की प्रमुख विशेषताओं को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है-

  1. सत्ता शक्ति का संस्थापक रूप है।
  2. सत्ता में शक्ति को वैधानिक स्वीकृति प्राप्त होने के कारण व्यक्तियों को उससे संबंधित आदेशों का पालन करना अनिवार्य होता है।
  3. सभी समाजों में सत्ता की प्रकृति एक समान नहीं होती। किसी समाज में इसका रूप वैधानिक होता है तो कहीं परंपरागत अथवा चमत्कारिक रूप होता है।
  4. सत्ता राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक सभी क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
  5. सत्ता का संबंध पद या प्रस्थिति से होता है न कि व्यक्ति से, जो भी व्यक्ति उस पद को धारण करता है वह उस पद से संबंधित सत्ता का उपयोग करता है।
  6. समय और आवश्यकतानुसार सत्ता के रूप में परिवर्तन होता रहता है।
  7. सत्ता के विभिन्न प्रारूप एक दूसरे से पूर्णतया अलग न होकर मिले-जुले होते हैं।

मैक्स वेबर के अनुसार सत्ता के प्रकार (Satta Ke Prakaar Max Weber)

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मैक्स वेबर ने सत्ता के तीन प्रकारों का उल्लेख किया है जो निम्नलिखित हैं-

1. वैधानिक सत्ता (Legal Authority)

वेबर ने लिखा है कि राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार कुछ पद ऐसे होते हैं जिनके साथ एक विशिष्ट प्रकार की सत्ता जुड़ी होती है अतः जो भी व्यक्ति उस पद को धारण करता है वह उस पद से जुड़ी सत्ता का उपयोग करता है, उनकी इसी सत्ता को हम वैधानिक सत्ता कहते हैं।


वेबर के अनुसार नौकरशाही व्यवस्था वैधानिक सत्ता का सबसे प्रमुख उदाहरण है। जैसे जिलाधीश को जो कि जिले का प्रमुख होता है यदि कोई व्यक्ति उस पद (जिलाधीश) पर पदस्थ होता है तो वह इस पद से संबंधित समस्त शक्तियों व अधिकारों का प्रयोग करता है एवं उसके अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों को उसके आदेशों का पालन अनिवार्य रूप से करना पड़ता है।


वैधानिक सत्ता का स्रोत व्यक्ति की निजी प्रतिष्ठा में निहित नहीं होता बल्कि उन नियमों में निहित होता है जिनके तहत वह एक विशिष्ट पद पर आसीन होता है। स्पष्ट है कि वैधानिक सत्ता का स्त्रोत स्वयं राज्य के कानून होते हैं।


वैधानिक सत्ता का अधिकार क्षेत्र सीमित व निश्चित होता है उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर वह अपनी सत्ता का प्रयोग नहीं कर सकता जैसे किसी विश्वविद्यालय की व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए कुलपति, कुलसचिव, डीन एवं विभागाध्यक्ष सभी को एक दूसरे से अलग-अलग अधिकार या सत्ता प्रदान की गई हैं।


इसमें से कोई भी अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोई कार्य करने के लिए स्वतंत्र नहीं होता। इसके साथ ही कोई व्यक्ति यदि किसी अधिकारी के पद पर कार्यरत है तो कार्यालय में उसके जो अधिकार हैं वह अधिकार घर पर नहीं है घर पर वह पति या पिता की सत्ता का उपयोग करेगा ना कि अधिकारी की।


वेबर ने यह भी स्पष्ट किया है कि वैधानिक सत्ता किसी ना किसी रूप में प्रत्येक युग की विशेषता रही है। दूसरा तथ्य यह है कि वैधानिक सत्ता मुख्यतः राजनीति तथा प्रशासनिक संगठन से संबंधित होती है लेकिन आर्थिक, धार्मिक तथा शैक्षणिक क्षेत्रों में भी वैधानिक सत्ता का एक स्पष्ट रूप देखा जा सकता है।


एक जटिल समाज में वैधानिक सत्ता प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में समान न होकर उसमें ऊंच-नीच का एक संस्तरण पाया जाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि वैधानिक आधार पर समाज में उच्च और निम्न सत्ताएँ हैं।

2. परंपरागत सत्ता (Traditional Authority)

परंपरागत सत्ता का स्रोत कानून न होकर परम्पराएँ होती है। परंपरागत सत्ता उस सत्ता को कहते हैं जो किसी व्यक्ति को परंपरागत रूप से स्वीकृत पद पर आसीन होने के नाते प्राप्त होती है।

रेमण्ड ऐरन ने परंपरागत सत्ता के बारे में लिखा है, " परंपरागत सत्ता वह है जो विशिष्ट गुणों की परंपरा के विश्वास पर आधारित होती है तथा जिसे एक लंबे समय से लोगों द्वारा स्वीकार किया जाता रहा है।"

वास्तव में भूतकाल के प्रति प्रेम और पवित्र निष्ठा के कारण ही लोग इस प्रकार की सत्ता के आदेशों का पालन करते हैं। उदाहरण के लिए कृषि युग में भारतीय गाँवों में पाई जाने वाली जाति पंचायतें जिनमें कि उनके द्वारा लिए गए फैसलों को पंच परमेश्वर द्वारा लिए गए फैसलों के रूप में देखा जाता था।

वेबर ने तीन उदाहरणों के द्वारा परंपरागत सत्ता की प्रकृति को स्पष्ट किया है जो निम्न प्रकार है-

(1) परंपरागत सत्ता का प्रथम रूप कुल पिता की परंपरा में देखने को मिलता है। पितृसत्तात्मक परिवारों में जहां कि संयुक्त परिवार व्यवस्था या उससे मिलते जलते परिवार होते हैं वहां परिवार की सत्ता परिवार के मुखिया या कुल-पिता में निहित होती है।

परिवार के सभी सदस्य उसके आदेशों का पालन करते हैं और ऐसा वे इसलिए नहीं करते कि उसे वैधानिक रूप प्राप्त है, बल्कि इसलिए करते हैं कि ऐसा परंपरागत रूप से होता चला आया है।

(2) परंपरागत सत्ता का दूसरा उदाहरण पैतृक शासन व्यवस्था के रूप में दिखाई पड़ता है। इस व्यवस्था में राजा का पुत्र ही उसका उत्तराधिकारी होता है। चूँकि इसमें राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि व विशिष्ट गुणों से संपन्न माना जाता है अतः उसकी सत्ता का रूप निरंकुश प्रकृति का होता है।

धर्म प्रधान समाजों में जब प्रजातंत्रात्मक शासन व्यवस्था का विकास नहीं हुआ था इसी प्रकार की परंपरागत सत्ता का रूप प्रभावी था। इसमें परंपरागत रुप से प्रजा राजा के आदेशों का पालन करती थी।

(3) परंपरागत सत्ता का तीसरा उदाहरण सामंतवादी व्यवस्था के रूप में दिखाई पड़ता है। इसके तहत एक पैतृक शासक अपनी सत्ता अनेक सामन्तों को सौंप देता है एवं ये सामंत अपने क्षेत्राधिकार में रहने वाले समस्त व्यक्तियों को अपने आदेशों का पालन करवाने के लिए अधिकृत हो जाते है।

इसमें एक सामन्त की मृत्यु के पश्चात उसकी सत्ता परंपरागत रूप से उसके पुत्र को प्राप्त होती है। यह भी परंपरा के अनुसार निर्धारित होने वाली एक निरंकुश सत्ता होती है।

3. करिश्माई सत्ता (Charismatic Authority)

वेबर के अनुसार करिश्माई सत्ता न तो वैधानिक नियमों पर आधारित होती हैं और ना ही परंपरा पर बल्कि करिश्मा पर आधारित होती है। व्यक्ति में कुछ ऐसी विलक्षण या चमत्कारिक क्षमता होती है जिसके कारण व्यक्ति को स्वयं ही समाज में एक विशेष सत्ता प्राप्त हो जाती है।

यह सत्ता वास्तविक भी हो सकती है अथवा काल्पनिक भी लेकिन उस पर विश्वास करने वाले व्यक्तियों के द्वारा उसकी सत्ता को स्वीकार कर दिया कर लिया जाता है।

इस प्रकार कोई भी नायक, योद्धा, तांत्रिक, पैगंबर अथवा नेता जो अपने चमत्कारी कार्यों के द्वारा अन्य व्यक्तियों से जो उसके प्रति निष्ठा रखते हैं आज्ञा पालन की मांग करता है।

लोग इन अद्वितीय गुणों के कारण ऐसे लोगों की सत्ता स्वीकार कर लेते हैं। इन गुणों को दैवीय गुणों के समान या उनके अंश के रूप में माना जाता है। इस तरह की सतह से संपन्न व्यक्ति की आज्ञा का पालन लोग श्रद्धा एवं भक्ति के साथ करते हैं।

जैसे भारत में गांधीजी की सत्ता को चमत्कारिक या करिश्माई सत्ता की श्रेणी में रखा जा सकता है जिनके आवाहन पर लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था लिया तथा जिनके एक इशारे पर लोग अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर रहते थे।

वेबर के अनुसार इस प्रकार की सत्ता की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि परिस्थिति के अनुरूप यह सत्त भी वैधानिक या परंपरात्मक सत्ता में परिवर्तित हो जाती है। यह भी सत्य है कि करिश्माई सत्ता की अवधि अधिक लंबी नहीं होती।

वेबर ने लिखा है कि जब कभी चमत्कारी सत्ता से संपन्न व्यक्ति अपने शिष्यों की आकांक्षा के अनुरूप अपने चमत्कार को सिद्ध नहीं कर पाता तो उसकी सत्ता कमजोर पड़ने लगती है।

वेबर ने सत्ता के इन प्रकारों के साथ ही दो प्रमुख तथ्यों पर ध्यान देना अनिवार्य बताया है पहला तो यह है कि विभिन्न समाजों में सत्ता के तीनों प्रकार पृथक-पृथक नहीं होते बल्कि इनका मिला-जुला रूप दिखाई पड़ता है।

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य है कि सत्ता की प्रकृति तुलनात्मक होती है क्योंकि परिस्थितियों के अनुसार सत्ता के रूप में भी परिवर्तन होने की संभावना बनी रहती है।

वेबर ने लिखा है, यह परिवर्तन इसलिए होता है कि शासक अपनी शक्ति की सीमाओं का उल्लंघन करके सत्ता का उपयोग व्यक्तिगत हितों को पूरा करने के लिए करने लगते हैं तब कुछ लोग जागरूक होकर एवं अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखने के लिए परंपरागत या करिश्माई सत्ता को अस्वीकृत कर देते हैं।

अतः जब भी उन्हें अवसर मिलता है, वे अपने नेता के चमत्कार को भ्रमपूर्ण सिद्ध करके एक नई व्यवस्था स्थापित करने का प्रयत्न करने लगते हैं। परिणामतः सत्ता की एक प्रणाली दूसरी प्रणाली में परिवर्तित होने लगती हैं

वेबर ने उन दशाओं का भी उल्लेख किया है जो कि समाज में एक विशेष प्रकार की सत्ता को स्थाई बनाए रखने में योगदान करती है। सबसे पहले तो जिन व्यक्तियों के हाथों में सत्ता होती है वे संगठित होते हैं व उनकी संख्या कम होती है तथा वे अपनी नीतियों की गोपनीयता बनाए रखते हैं जिसके कारण वे अपनी सत्ता को स्थाई बना पाने में सफल होते हैं।

दूसरी बात यह है कि एक विशेष सत्ता से संबंधित अधिकांश व्यक्ति सत्ता के आदेशों का पालन करने में अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं अतः वे दूसरे लोगों को भी प्रेरित करते रहते हैं कि वे उस सत्ता में विश्वास करें।

तीसरी बात यह है कि सत्ता संपन्न व्यक्ति प्रभावशाली लोगों को विशेष लाभ पहुंचाकर योजनाबद्ध तरीके से विरोधियों की संख्या को कम कर देते हैं तथा चौथी व अंतिम बात यह है कि सत्ता पर काबिज व्यक्ति यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि वे अपने सभी कार्य जन सामान्य के हित को ध्यान में रखकर कर रहे हैं।

यही वे स्थितियां या दशाएँ हैं जो जन सामान्य को एक विशेष सकता स्वीकृत करने व मान्यता देने की प्रेरणा देती है।

निष्कर्ष:

तो इस आर्टिकल का निष्कर्ष यह है कि मैक्स वेबर ने सत्ता के तीन प्रकारों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है तथा हमें सरलता पूर्वक समझाया है। सत्त के विभिन्न तीन प्रकार निम्नलिखित हैं
  • वैधानिक सत्ता
  • परंपरागत सत्ता
  • करिश्माई सत्ता

दोस्तों इस आर्टिकल में हमने आपको बताया है कि मैक्स वेबर के अनुसार सत्ता के कौन-कौन से प्रकार हैं तथा सत्ता की विशेषताएं कौन-कौन सी है। तो इस आर्टिकल में हमने सब कुछ जानकारी दी है और सत्ता के प्रकारों को विस्तार पूर्वक बताया है।

तो अगर आपको इस आर्टिकल से सत्ता के प्रकारों की जानकारी मिल गई हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ भी जरूर शेयर करें ताकि उनको भी सत्ता के प्रकारों के बारे में जानकारी प्राप्त हो सके।


धन्यवाद..

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