नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम आपको Chintan Ka Arth Aur Paribhasha के बारे में बताएंगे। चिंतन का अर्थ और परिभाषा प्रश्न बहुत इंपोर्टेंट है। यह प्रश्न B.Ed के विद्यार्थियों से पूछा जाता है और यह प्रश्न B.Ed के विद्यार्थियों के विषय में उपलब्ध है। जो विद्यार्थी B.Ed की डिग्री कर रहे हैं तथा अपने भविष्य में मास्टर या टीचर बनना चाहते है तो उनके लिए यह प्रश्न है बहुत महत्वपूर्ण है।
इसलिए आपको चिंतन का अर्थ और परिभाषा के बारे में तथा चिंतन के बारे में जानना बहुत जरूरी है। तो चलिए शुरू करते हैं चिंतन के अर्थ और परिभाषा के बारे में जानकारी -
चिंतन का अर्थ एवं परिभाषा / Chintan Ka Arth Aur Paribhasha (Meaning and definition of thinking)
चिंतन का अर्थ -
मनुष्य को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है। इसका कारण है उसका चिंतनशील होना। जीव धारियों में मनुष्य ही सर्वाधिक चिंतनशील है और यही चिंतन मनुष्य और उसके समाज के विकास का कारण है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य की चिंतन शक्तियों को विकसित किया जाता है।
मनुष्य के सामने कभी कभी किसी समस्या का उपस्थिति होना स्वभाविक है। ऐसी दशा में वह उस समस्या का समाधान करने के उपाय सोचने लगता है। वह इस बात पर विचार करना आरंभ कर देता है कि समस्या को किस प्रकार समझाया जा सकता है। उसके इस प्रकार सोचने या विचार करने की क्रिया को चिंतन कहते हैं। दूसरे शब्दों में 'चिंतन विचार करने की वह मानसिक प्रक्रिया है, जो किसी समस्या के कारण आरंभ होती है और उसके अंत तक चलती रहती है।
यह भी पढ़ें - आदर्श प्रारूप की व्याख्या कीजिए
चिंतन की परिभाषाएं / Chintan ki Paribhasha
चिंतन के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करने के लिए कुछ मनोवैज्ञानिकों के विचारों से चिंतन के बारे में समझते हैं -
1. राॅस - " चिंतन, मानसिक क्रिया का ज्ञानात्मक पहलू है या मन की बातों से संबंधित मानसिक क्रिया है।"
2. वारेन - " चिंतन एक प्रतीकात्मक स्वरूप की विचारात्मक प्रक्रिया है। इसका आरंभ व्यक्ति के समक्ष उपस्थित किसी समस्या या कार्य से होता है। प्रयत्न तथा भूल से युक्त समस्या प्रवृत्ति से प्रभावित क्रिया होती है। इसके अंत में समस्या का समाधान मिलता है।"
3. रायबर्न - " चिंतन इच्छा संबंधी प्रक्रिया है जो किसी असंतोष के कारण आरंभ होती है और प्रयास एवं त्रुटि के आधार पर चलती हुई उस अंतिम स्थिति पर पहुंच जाती है जो इच्छा को संतुष्ट करती है।"
4. वैलेन्टाइन - " चिंतन शब्द का प्रयोग उस क्रिया के लिए किया जाता है जिसमें श्रृंखलाबद्ध विचार किसी लक्ष्य या उद्देश्य की ओर अविराम गति से प्रवाहित होते हैं।"
इन परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि चिंतन मानसिक क्रिया का ज्ञानात्मक पथ है। यह प्रक्रिया किसी विशेष उद्देश्य की ओर परिलक्षित होती है। इसमें इच्छा तथा असंतोष का महत्व है। इच्छा तथा असंतोष मनुष्य को चिंतन करने के लिए विवश करते हैं।
चिंतन की विशेषताएं / Chintan Ki Visheshtaen (Charcteristics of Thinking)
सी.टी. मार्गन के शब्दों में, " वास्तव में प्रतिदिन की वार्ता में प्रयोग होने वाले चिंतन शब्द में विभिन्न क्रियाओं की संरचना निहित है।" इसका संबंध गंभीर विचारशील क्रिया से है। इस दृष्टि से चिंतन की विशेषताएं इस प्रकार हैं -
- विशिष्ट गुण ➡ चिंतन मानव का एक विशिष्ट गुण है जिसकी सहायता से वह अपनी बर्बर अवस्था से सभ्य अवस्था तक पहुंचने में सफल हुआ है।
- मानसिक प्रक्रिया ➡ चिंतन मानव की किसी इच्छा, असंतोष, कठिनाई या समस्या के कारण आरंभ होने वाली एक मानसिक प्रक्रिया है
- भावी आवश्यकता की पूर्ति हेतु व्यवहार ➡ चिंतन किस वर्तमान या भावी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए एक प्रकार का व्यवहार है। हम अंधेरा होने पर बिजली का स्विच दबाकर प्रकाश कर लेते हैं और मार्ग पर चलते हुए सामने से आने वाली मोटर को देखकर एक साइड हो जाते हैं।
- समस्या समाधान ➡ मर्सेल के अनुसार, " चिंतन उस समय आरंभ होता है जब व्यक्ति के समक्ष कोई समस्या उपस्थित होती है और वह उसका समाधान खोजने का प्रयत्न करता है।
- अनेक विकल्प ➡ चिंतन की सहायता से व्यक्ति अपनी समस्या का समाधान करने के लिए अनेक उपायों पर विचार करता है। अंत में वह उनमें से एक का प्रयोग करके अपनी समस्या का समाधान करता है।
- समस्या समाधान तक चलने वाली प्रक्रिया ➡ इस प्रकार चिंतन एक पूर्ण और जटिल मानसिक प्रक्रिया है जो समस्या की उपस्थिति के समय से आरंभ होकर उसके समाधान के अंत तक चलती रहती है।
चिंतन के प्रकार / Chintan Ke Prakar (Kinds of Thinking)
चिंतन चार प्रकार का होता है -
1. प्रत्यक्षात्मक चिंतन ➡
इस चिंतन का संबंध पूर्व अनुभवों पर आधारित वर्तमान की वस्तुओं से होता है। माता-पिता के बाजार से लौटने पर यदि बालक को उनसे काफी दिनों तक टाफी मिल जाती है, तो जब भी वे बाजार से लौटते हैं तभी टाफी का विचार उसके मस्तिष्क में आ जाता है और वह दौड़ता हुआ उनके पास जाता है। यह निम्न स्तर का चिंतन है। अतः यह विशेष रूप से पशुओं और बालकों में पाया जाता है। इसमें भाषा और नाम का प्रयोग नहीं किया जाता है।
2. प्रत्ययात्मक चिंतन ➡
इस चिंतन का संबंध पूर्व निर्मित प्रत्ययों से होता है जिनकी सहायता से भविष्य के किसी निश्चय पर पहुंचा जाता है। कुत्ते को देखकर बालक अपने मन में प्रत्यय का निर्माण कर लेता है। अतः जब वह भविष्य में कुत्ते को फिर देखता है तब वह उसकी ओर संकेत करके कहता है - 'कुत्ता' । इस चिंतन में भाषा और नाम का प्रयोग किया जाता है।
3. कल्पनात्मक चिंतन ➡
इस चिंतन का संबंध पूर्व अनुभवों पर आधारित भविष्य से होता है। जब माता-पिता बाजार जाते हैं तब बालक कल्पना करता है कि वे वहां से लौटने पर उसके लिए टॉफी लाएंगे। इस चिंतन में भाषा और नाम का प्रयोग नहीं किया जाता है।
4. तार्किक चिंतन ➡
यह सबसे उच्च प्रकार का चिन्तन। है इसका संबंध किसी समस्या के समाधान से होता है। जॉन डीवी ने इसको विचारात्मक चिंतन की संज्ञा दी है।
चिंतन की क्रिया में अनेक क्रियाएँ शामिल रहती हैं। इसमें प्रमुख भूमिका रहती है प्रयत्न एवं भूल की। इसमें विचार का संकेत रहता है। सड़कों पर लिखा रहता है - सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इसमें सावधान रहने का संकेत है।
चिंतन एक ज्ञानात्मक क्रिया है। इसमें प्रत्ययात्मक तथा कल्पनात्मक ज्ञान निहित होता है। प्रतीकों का प्रयोग भी किसमें किया जाता है।
चिंतन के सोपान / Chintan Ke Sopan
चिंतन के सोपान निम्नलिखित हैं -
1. समस्या का आंकलन ➡
चिंतन समस्या के उत्पन्न होने से उत्पन्न होता है। मूर्त तथा अमूर्त समस्याएं, जिज्ञासा के माध्यम से चिंतन का आरंभ करती हैं। मूर्त से अमूर्त की ओर इस पद में बढ़ा जाता है।
2. संबंधित तथ्यों के संकलन ➡
समस्या को समझने के बाद उन तथ्यों को एकत्र किया जाता है जो समस्या का कारण खोजने में सहायक होते हैं। तथ्यों के संकलन में प्रेरणा का महत्व भी होता है।
3. निष्कर्ष पर पहुंचना ➡
तथ्यों का संकलन कर उनका विश्लेषण किया जाता है। इस विश्लेषण से किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है।
4. निष्कर्ष का परीक्षण ➡
चिंतन में प्राप्त परिणामों का परीक्षण कर उसकी जांच की जाती है। इससे चिंतन की वैधता तथा विश्वसनीयता की परीक्षा हो जाती है।
चिंतन के विकास के उपाय (Methods og Developing Thinking)
क्रो व क्रो के शब्दों में - " स्पष्ट चिंतन की योग्यता सफल जीवन के लिए आवश्यक है। जो लोग उद्योग, कृषि या किसी मानसिक कार्य में दूसरों के आगे होते हैं, वे अपनी प्रभावशाली चिंतन की योग्यता में साधारण व्यक्तियों से श्रेष्ठ होते हैं।"
इस कथन से चिंतन का महत्व स्पष्ट हो जाता है। अतः यह आवश्यक है कि शिक्षक बालकों की चिन्तनशक्ति का विकास करे। वह ऐसा निम्नलिखित उपायों की सहायता से कर सकता है -
- भाषा, चिंतन के माध्यम और अभिव्यक्ति की आधारशिला है। अतः शिक्षक को बालकों के भाषा-ज्ञान में वृद्धि करनी चाहिए।
- ज्ञान, चिंतन का मुख्य स्तंभ है। अतः शिक्षक को बालकों के ज्ञान का विस्तार करना चाहिए।
- तर्क, वाद-विवाद और समस्या समाधान चिंतन शक्ति को प्रयोग करने का अवसर देते हैं। अतः शिक्षक को बालकों को इन बातों के लिए आवसर देना चाहिए।
- उत्तरदायित्व, चिंतन को प्रोत्साहित करता है। अतः शिक्षक को बालकों को उत्तरदायित्व के कार्य सौंपने चाहिए।
- रुचि और जिज्ञासा का चिंतन में महत्वपूर्ण स्थान है। अतः शिक्षक को बालकों की इन प्रवृत्तियों को जागृत रखना चाहिए।
- प्रयोग, अनुभव और निरीक्षण, चिंतन को शक्तिशाली बनाते हैं। अतः शिक्षक को बालकों के लिए इनसे संबंधित वस्तुएं जुटानी चाहिए।
- शिक्षक को अपने अध्यापन के समय बालकों से विचारात्मक प्रश्न पूछ कर उनकी चिंतन की योग्यता में वृद्धि करनी चाहिए।
- शिक्षक को बालकों को विचार करने और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
- शिक्षक को प्रश्न पत्र में ऐसे प्रश्न देने चाहिए, जिनके उत्तर बालक भली-भांति विचार करने के बाद ही दे सकें।
- शिक्षक को बालकों में निष्क्रिय रखने की आदत नहीं पड़ने देनी चाहिए क्योंकि इस प्रकार का रटना चिंतन का घोर शत्रु है।
- शिक्षक को बालकों को समस्या को समझने और उसका समाधान खोजने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
यह उपाय बालकों में चिंतन और अधिगम दोनों की प्रक्रियाओं के विकास में योग देता है। मारसेल का मत है- "समस्या का ज्ञान और उसके समाधान की खोज यही चिंतन की प्रक्रिया है और यही सीखने की भी प्रक्रिया है।
निष्कर्ष:
तो दोस्तों आज के इस लेख में हमने सीखा चिंतन का अर्थ एवं परिभाषा के बारे में और चिंतन के विकास के उपाय तथा चिंतन के प्रकार एवं विशेषताएं आदि के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त की है। तो उम्मीद करते हैं आपको यह लेख पसंद आया होगा।
क्या आप जानते हैं?
ब्रह्मा विष्णु महेश जी के माता पिता कौन है?
हम इस संसार में मरते क्यों हैं?
हमें मनुष्य जीवन में क्या करना चाहिए?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए कृपया अवश्य पढ़ें पवित्र पुस्तक "ज्ञान गंगा"।
डाउनलोड करने के लिए हमारा व्हाट्सएप चैनल फॉलो करें ➡ Whatsapp Channel
FAQ.
Q. मनोविज्ञान में चिंतन क्या है?
मनोविज्ञान में चिंतन वह प्रक्रिया जिसके द्वारा हम किसी वस्तु के बारे में सोचने या अपनी समस्या के समाधान के उपाय के बारे में सोचने की क्रिया करते है.
👇👇👇👇👇👇


दोस्तों अगर आपको यह जानकारी पसंद आई है तो कृपया हमें कमेंट करके जरूर बताएं। धन्यवाद।