नमस्कार दोस्तों आज के इस लेख में हम बात करेंगे Adarsh Prarup Ki Vyakhya के बारे में आदर्श प्रारूप की व्याख्या और आदर्श प्रारूप का अर्थ और परिभाषा क्या है? इसके बारे में चर्चा करेंगे। दोस्तों अगर आप यह लेख पूरा पढ़ते हैं तो आपको मैक्स वेबर के अनुसार आदर्श प्ररूप क्या है? इसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त हो जाएगी। इसीलिए इस लेख को पूरा जरूरत पढ़ें ताकि आपको Aadarsh Praroop के बारे में जानकारी प्राप्त हो सके। तो चलिए आज का लेख शुरू करते हैं -
आदर्श प्रारूप की व्याख्या/Adarsh Prarup Ki Vyakhya
Max Waber के समय तक जर्मनी में यह परंपरा दृढ़ हो गई थी कि जिन पद्धतियों से प्राकृतिक विज्ञानों में घटनाओं का अध्ययन और विश्लेषण किया जाता है, उन्हीं पद्धतियों को सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। सामाजिक विज्ञानों में केवल ऐतिहासिक पद्धति के द्वारा ही सामाजिक घटनाओं की व्याख्या व विश्लेषण किया जा सकता है।
मैक्स वेबर व्यतिकरण और विशिष्टीकरण के विरोधी थे। इतिहास में जो व्यक्ति करण है उसे वे उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे अतएव उन्होंने सामाजविज्ञान के संदर्भ में आदर्श प्रारूप की अवधारणा को प्रस्तुत किया। वेबर के अनुसार सामाजिक यथार्थता अनंत होती है। उसमें विविधता होती है अतः कोई भी वैज्ञानिक व्यवस्था संपूर्ण समाज के यथार्थ को किसी भी एक अवधारणा में नहीं समेट सकती।
इस दुविधा से मुक्ति पाने के लिए वेबर ने आदर्श प्रारूप की अवधारणा को प्रस्तुत किया। वेबर ने अपने अध्ययन के लिए कुछ आदर्श प्रारूप बनाए थे उनमें सामाजिक क्रिया, नौकरशाही, सत्ता, पूंजीवाद, प्रोटेस्टेंट एथिक आदि प्रमुख हैं।
आदर्श प्रारूप की अवधारणा वेबर के पद्धतिशास्त्रीय अंतर्दृष्टि की गहन सूझबूझ का परिणाम है। वेबर के पद्धतिशास्त्रीय विचारों में आदर्श प्रारूप एक बुनियादी अवधारणा है। वेबर का यह स्पष्ट मत रहा है कि यदि सामाजिक घटनाओं को तार्किक रूप से समझना है तो समाजशास्त्रियों को चाहिए कि वे शोध विषय से संबंधित आदर्श प्रारूपों की खोज करें।
आदर्श प्रारूप का अर्थ एवं परिभाषा :-
प्लीज दोस्तों अब बात करते हैं आदर्श प्रारूप का अर्थ एवं परिभाषा के बारे में -
आदर्श प्रारूप का अर्थ :
मैक्स वेबर के अनुसार "तर्कसंगत रीति से समाजिक घटनाओं के कार्यकारण संबंधों को तब तक स्पष्ट नहीं किया जा सकता जब तक कि उन घटनाओं को पहले समानता के आधार पर कुछ सैद्धांतिक श्रेणियों में बांट ना लिया जाए और ऐसा करने पर हमें कुछ आदर्श टाइप घटनाएं मिल जाएंगी। मैक्स वेबर कहते हैं समाजशास्त्रियों को अपनी प्राक्कल्पना का निर्माण करने के लिए आदर्श अवधारणाओं का चयन करना चाहिए।
आदर्श प्रारूप ना तो औसत प्रारूप है, न ही आदर्शाात्मक, बल्कि वास्तविकता के कुछ विशिष्ट तत्वों के विचार पूर्वक चुनाव तथा सम्मिलन द्वारा निर्मित आदर्शात्मक मान हैं। दूसरे शब्दों में आदर्श प्रारूप का आशय है कुछ वास्तविक तथ्यों के तर्कसंगत आधार पर यथार्थ अवधारणाओं का निर्माण करना।"
मैक्स वेबर के आदर्श प्रारूप का संबंध किसी प्रकार के मूल्यांकन से नहीं है। व्यक्ति अपने अध्ययन के लिए किसी भी तथ्य या घटना के आदर्श प्रारूप बना सकता है। वेश्याओं से लेकर धार्मिक नेताओं तक सब के आदर्श प्रारूप बनाए जा सकते हैं।
वास्तव में सामाजिक घटनाओं का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत एवं जटिल है इस कारण यह आवश्यक है कि कुछ सामान्य समानताओं के आधार पर विचार पूर्वक तथा तर्कसंगत तरीके से कुछ वास्तविक घटनाओं या व्यक्तियों को इस प्रकार चुना जाए कि वे चुनी हुई घटनाएं या वस्तुएं उस प्रकार की समस्त घटनाओं या व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व कर सकें। इस प्रकार के चुनाव और सम्मिलन द्वारा जिस टाइप का निर्माण होता है उसे 'आदर्श टाइप' या आदर्श प्रारूप कहते हैं।
यह आदर्श इसलिए नहीं है कि इसके निर्माण में आदर्शात्मक विचार, अनुमान या पद्धति का अनुसरण किया गया है बल्कि यह आदर्श इस अर्थ में है कि यह एक विशिष्ट श्रेणी या टाइप है जो कि उस प्रकार की संपूर्ण घटना या समस्त व्यवहार या क्रिया की वास्तविकता को व्यक्त करता है। अध्ययन पद्धति की दृष्टि से इससे अध्ययन कार्य में यथार्थता आती है।
यदि हमें सामाजिक स्थितियों का जैसे कि क्रांति, वर्ग, धर्म, समाजवाद आदि का तुलनात्मक अध्ययन करना है तो इसकी विधि आदर्श प्रारूप है। वेबर कहते हैं, "आदर्श प्रारूप, प्राक्कल्पनात्मक मूर्त स्थितियां हैं। इनका निर्माण सामाजिक यथार्थ के आधार पर किया गया है तथा इनका निश्चित उपयोग तुलनात्मक है।"
रेमंड एरन ने वेबर के आदर्श प्रारूप की व्याख्या विधिशास्त्र के विशाल संदर्भ में की है। इसके निर्माण का उद्देश्य अनुसंधानकर्ता की समझ को विकसित करना है। आदर्श प्रारूप का निर्माण समाजशास्त्र को एक विज्ञान का दर्जा देने के लिए तथा अध्ययन सामग्री को समझने के लिए किया गया है।
उन्होंने लिखा है, "आदर्श प्रारूप का निर्माण इसलिए किया गया है कि हम कार्य कारण की व्याख्या सही तरह से कर सकें। आदर्श प्रारूप हमें ऐतिहासिक तत्वों को समझने में सहायक होता है, लेकिन ये ऐतिहासिक या सामाजिक तत्व संपूर्ण ना होकर आंशिक ही होते हैं।"
आदर्श प्रारूप की परिभाषा:
जुलियेन फ्रेण्ड के अनुसार- "आदर्श प्रारूप सब मिलाकर उन सभी अवधारणाओं का जोड़ है जिनका निर्माण विशेषज्ञ विशुद्ध रूप से अनुसंधान के उद्देश्य से करते हैं।"
वास्तविकता अनंत होती है कोई भी पद्धति या अध्ययन व्यवस्था ऐसी नहीं है जिससे कि वास्तविकता को संपूर्ण व यथावत समझा जा सके। इस प्रकार प्रत्येक ज्ञान वास्तविकता के आधार पर प्राक्कल्पनात्मक रूप में समझा जा सकता है एवं आदर्श प्रारूप इसे समझने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद्धति है।
धन्यवाद..।
निष्कर्ष:
तो दोस्तों आज के इस लेख में हमने जाना Adarsh Prarup Ki Vyakhya के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी। उम्मीद करते हैं आपको यह लेख पसंद आया होगा। अगर पसंद आया है तो कृपया इसे अपने दोस्तों के साथ भी जरूर शेयर करें ताकि उनको भी आदर्श प्रारूप की व्याख्या के बारे में जानकारी प्राप्त हो सके।
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