हेलो दोस्तों नमस्कार आज के इस लेख में हम आपको भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं के बारे में विस्तार से बताने वाले हैं। यह प्रश्न b.a. तृतीय वर्ष के राजनीति विज्ञान से लिया गया है। इस प्रश्न को ध्यान पूर्वक और पूरा जरूर पढ़ें क्योंकि यह महत्वपूर्ण प्रश्न है और यह प्रश्न परीक्षा में भी आ सकता है।
तो चलिए शुरू करते हैं -
नोट - दोस्तों यह प्रश्न चार प्रकार से पूछा जा सकता है
1. भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए
या
2. भारत की विदेश नीति के आधारभूत (प्रमुख) सिद्धांत क्या है? स्पष्ट कीजिए।
या
3. भारत की विदेश नीति में कौन-कौन से बुनियादी सिद्धांत निहित है? समझाइए।
या
4. भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धांत क्या है? लिखिए।
तो इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है बस आपको प्रश्न के शब्दों पर ध्यान देना होगा। तो आइए शुरू करते हैं -
भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएं / Bharatiya Videsh Niti Ki Visheshtayen
भारतीय विदेश नीति के आधारभूत या बुनियादी सिद्धांत या विशेषताएं निम्नलिखित हैं -
- असंलग्नता (गुटनिरपेक्षता) की नीति
- साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद का विरोध
- साधनों की पवित्रता की नीति
- Afro-asian एकता
- विरोधी गुटों के बीच सेतुबंध बनाने की नीति
- संयुक्त राष्ट्र संघ का समर्थन करने वाली नीति
- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की नीति (विश्व शांति संबंधी विदेश नीति)
- 'पंचशील' पर जोर देने वाली नीति
- निःशस्त्रीकरण में विश्वास
- विश्व शांति में विश्वास
1. असंलग्नता (गुटनिरपेक्षता) की नीति :
भारत विदेश नीति का प्रमुख सिद्धांत गुटनिरपेक्षता की नीति है अर्थात भारत अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में असंलग्नता की नीति अपनाएगा एवं गुटबंदी से दूर रहते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व के राष्ट्रों से समानता के आधार पर मधुर व मित्रवत संबंध रखिएगा और भारत अनेक संकटों के पश्चात भी असंलग्नता की नीति का पालन करता रहा है। यह असंलग्नता की नीति गुटनिरपेक्षता की नीति के नाम से जानी जाती है।
2. साम्राज्यवाद - उपनिवेशवाद का विरोध :
भारत साम्राज्यवाद के दुष्परिणामों का स्वयं भुक्तभोगी रहा है। अतः उसके लिए साम्राज्यवाद का विरोध करना अत्यंत स्वाभाविक है। प्रजातीय विभेद के कारण भी अंतर्राष्ट्रीय वातावरण दूषित होता है।
यही कारण है कि विश्व में कहीं भी विदेशी दासता के से मुक्ति पाने के लिए हुए संघर्ष का भारत ने खुलकर समर्थन किया है। बांग्लादेश की स्वतंत्रता में भारत की भूमिका तो एक 'मुक्तिदाता' सिद्ध हुई है।
3. साधनों की पवित्रता की नीति :
भारत की विदेश नीति गांधीवाद के अनुसार लक्ष्य प्राप्ति के साधनों की पवित्रता में विश्वास करती है। भारत की विदेश नीति महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा, शांति आदि विचारों से बहुत प्रभावित है। गांधीजी के अनुसार साधनों की प्राप्ति के साधन भी पवित्र होने चाहिए।
4. अफ्रो-एशियाई एकता :
एशियाई अफ्रीकी एकता को ठोस रूप देने के लिए भारत ने मार्च, 1947 में दिल्ली में एक एशियाई सम्मेलन का आयोजन किया। दूसरा सम्मेलन इंडोनेशिया के प्रश्न पर जनवरी, 1949 में दिल्ली में आयोजित किया गया।
18 अप्रैल 1955 को इंडोनेशिया के नगर बांडुंग में अफ्रो-एशियाई देशों ने हिस्सा लिया जिसमें उपनिवेशवाद का विरोध किया गया। पंचशील सिद्धांतों में आस्था व्यक्त करते हुए उनका विस्तार किया गया और एक दूसरे के साथ सहयोग के वचन दिए गए।
वर्तमान समय में भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अंदर एशियाई अफ्रीकी एकता ने एक ठोस रूप ले लिया है और यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय संगठन महाशक्तियों के संकेतों पर नहीं चल सकता।
5. विरोधी गुटों के बीच सेतुबंध बनाने की नीति :
भारत ने अपनी गुटनिरपेक्षता नीति पर चलते हुए विश्व को दो गुटों पूंजीवादी (अमेरिका समर्थक) एवं साम्यवादी (रूस प्रभावित) में विभाजित करने के बजाय उन्हें जोड़ने के लिए सेतुबंध की भूमिका निभाई है क्योंकि दोनों गुटों के बीच शक्ति संतुलन का मोहरा भारत है।
भारत के प्रयासों से ही विश्व शांति की रक्षा के लिए महाशक्तियों के बीच सीधे संपर्क के लिए अब हॉट लाइन बिछा दी गई है। महा शक्तियों के बीच इस स्थिति को लाने में अन्य कारणों के साथ भारत के प्रयत्नों का भी पर्याप्त योगदान रहा है।
6. संयुक्त राष्ट्र संघ का समर्थन करने वाली नीति :
भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का एक प्रारंभिक संस्थापक सदस्य और इसका बहुत बड़ा समर्थक है। भारत संयुक्त राष्ट्र संघ को विश्व शांति स्थापित करने वाला एक सहारा मानता है।
यही कारण था कि विश्व में राष्ट्रीय संघर्षों को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के आह्वान पर भारत ने अपनी शांति सेना भेजने में संकोच नहीं किया।
भारत ने संघ के विभिन्न अंगों और अभी करोड़ों में भाग लेकर महत्वपूर्ण कार्य किए हैं भारत का विश्वास है कि विश्व के देशों का विकास संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से ही संभव है।
7. अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की नीति ( विश्व शांति संबंधी विदेश नीति ) :
अंतर्राष्ट्रीय शांति भारत की विदेश नीति का मुख्य आदर्श है। विश्व शांति के लक्ष्य की प्राप्ति शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का मार्ग अपनाकर ही संभव है। इस आदर्श को ही अपनाते हुए भारत के प्रधानमंत्री ने पंचशील सिद्धांतों को विश्व स्तर पर मान्यता दिलवाई।
भारत ने सदैव ही अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की बात पर जोर दिया है। अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा तभी संभव है जब प्रत्येक राष्ट्र अपने विवादों का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से करें।
8. 'पंचशील' पर जोर देने वाले नीति :
पंचशील का सिद्धांत भारत की विदेश नीति का प्रमुख आधार है। इसका प्रतिपादन 1954 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई ने आपसी बातचीत के द्वारा किया था। पंचशील के पांच सिद्धांत निम्नलिखित हैं -
- प्रत्येक राज्य को दूसरे राज्य की प्रादेशिक अखंडता और सर्वोच्च सत्ता का सम्मान करना चाहिए।
- एक दूसरे देश पर आक्रमण न करना।
- एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
- एक दूसरे के साथ समानता तथा पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों के आधार पर संबंध स्थापित करना।
- शांतिमय सह अस्तित्व के सिद्धांत के अस्तित्व को स्वीकार करना।
9. निःशस्त्रीकरण में विश्वास :
भारत का यह विश्वास है कि विश्व शांति की स्थापना हेतु विश्व में चल रही शस्त्रों की होड़ को विश्व द्वारा सभी राष्ट्रों के समानता के आधार पर समाप्त किया जाना चाहिए। अणुशक्ति का प्रयोग मानव जाति को सुखी और समृद्ध बनाने में किया जाना चाहिए।
सी.टी.बी.टी. संधि परमाणु हथियारों की समाप्ति में राष्ट्रों को समानता प्रदान नहीं करती है। इसीलिए यह संधि भारत को स्वीकार नहीं है।
10. विश्व शांति में विश्वास :
भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हित व विकास को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण संबंध कायम करने, विश्व शांति व सुरक्षा बनाए रखने में सहयोग तथा समानता के आधार पर हर क्षेत्र में सम्मानजनक रूप से दूसरे राष्ट्रों से सहयोग प्राप्त करना व देने की रही है।
भारत ने विदेश नीति के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कुछ सिद्धांतों का पालन किया है। यह सिद्धांत न केवल विदेश नीति के तर्कसंगत विश्लेषण में सहायक होते हैं, बल्कि नीति को निरंतरता भी प्रदान करते हैं। इन सिद्धांतों के विवेचन से पूर्व इनके विकास से संबंधित दो बातों का उल्लेख आवश्यक है।
प्रथम, भारतीय विदेश नीति का स्वरूप विकासवादी रहा है, अतः इन सिद्धांतों के प्रतिपादन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्वाधीनता संघर्ष के दौरान अपनाई गई नीतियों एवं अनुभवों का विशेष स्थान रहा है।
द्वितीय, भारतीय विदेश नीति के निर्माताओं के विश्व एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति दृष्टिकोण एवं रुझान ने भी इन सिद्धांतों के प्रतिपादन में प्रभावी भूमिका का निर्वाह किया है।
इस संदर्भ में जवाहरलाल नेहरू विश्व को दो सैन्य गुटों में विभाजित मानते थे जो शक्ति संतुलन के सिद्धांत पर आधारित थे। इसके अतिरिक्त वे इस प्रकार की विरोधी विचारधाराओं वाली विश्व व्यवस्था में एक विश्व की कामना करते हुए मानते थे कि,
"दुनिया संघर्षों, घृणाओं एवं आंतरिक द्वंद्व के बावजूद अंततः अंतर्रष्ट्रीय सहयोग एवं विश्व संघ की ओर अग्रसर होगी। भारत जैसे नव-स्वतंत्र देशों को गुटों में विभाजित विश्व में सेतुबंध की भूमिका का निर्वाह करना है।"
निष्कर्ष :
तो दोस्तो इस लेख में हमने आपको बताया है भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं के बारे में। इस लेख में भारत की विदेश नीति की विशेषताओं से सम्बंधित डिटेल में जानकारी दी है। अतः हम उम्मीद करते हैं कि इस लेख के माध्यम से आपको भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं की जानकारी मिल गई होगी।
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